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क्या भारत भ्रष्ट, लुटेरों और डकैतों का देश है ?

     क्या भारत भ्रष्ट, लुटेरों और डकैतों का देश है? देश में हो रही आये-दिन की घटनाएं तो यही बयां करती है। यह आश्चर्यजनक है कि भारत सरकार के महिला और बाल विकास मंत्रालय ने हाल ही प्रशिक्षण एवं नियोजन की एक योजना के तहत देश की स्वयंसेवी संस्थाओं को सरकार से वित्तीय अनुदान पाने के लिए आवेदन आमंत्रित किए जिसमें इस योजना के तहत महिलाओं को रोजगार का प्रशिक्षण देने की बात थी। इस योजना के लिए मंत्रालय को देश भर से लगभग 1500 आवेदन-पत्र मिले। इनकी जाँच के उपरांत ये कटु तथ्य सामने आया कि इनमें 90 प्रतिशत स्वयंसेवी संगठन फर्जी पाए गए। मंत्रालय का कहना है कि जाँच में यह बात भी सामने आई कि कई संगठन तो ऐसे थे, जिन्होंने अपने अनुषांगिक संगठनों के नामों से अनुदान उठाने के लिए इस योजना के तहत आवेदन भेजे। इसका क्या अर्थ निकला जाये! जाहिर है कि नमक में आटा तो सब मिलाते हैं, लेकिन यहाँ तो नमक में ही आटा मिलाया जा रहा था। देश में उदारीकरण के बाद से एनजीओ का युग प्रारंभ हुआ और इसका लाभ उठाने वालों में हमारे राजनेता ही सबसे आगे रहे। देश का शायद ही कोई ऐसा राज्य होगा जहाँ हमारे राजनेता इसमें पीछे होंगे। अगर सारे स्वयंसेवी संगठनों अर्थात एनजीओ के संचालकों का सही-सही पता लगाया जाये तो ये तथ्य भी किसी से छिपा नहीं रहेगा कि इन एनजीओ के अध्यक्ष अथवा संरक्षक हमारे सभी दलों के राजनीतिज्ञ अथवा उनके सगे-संबंधी ही मिलेंगे। प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उनकी किसी न किसी रूप में भागीदारी अथवा पकड़ मिलेगी। 
    यानी देश में जनकल्याण की कोई भी योजना बने, वह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़नी ही है और भ्रष्ट दिमागों के लोग उसके माध्यम से लूट मचाने के तमाम रास्ते पहले ही खोज निकाल लेते हैं। ये देश कैसे ऊंचा उठेगा, भ्रष्टाचार से किस प्रकार मुक्त होगा, समझ नहीं आता। एक तरफ देश में लोकपाल कानून है और सूचना का अधिकार जैसे कानून बने हुए हैं तो दूसरी ओर आये दिन हमारे उच्च स्तरीय अधिकारी घूस लेते पकडे जा रहे हैं और रोजाना समाचार-पत्रों की सुर्खिया बने रहते हैं। इसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा कि बैंकों के बड़े अधिकारियों से लेकर, उच्च शिक्षा, चिकित्सा, पीडब्ल्यूडी, फारेस्ट,जलदाय,आयकर,वाणिज्य कर,बिजली, पर्यावरण और वन,खनिज लोकसेवा आयोग, गृह, यातायात आदि कोई विभाग ऐसा नहीं जो इस रोग से अछूता बचा हो। कानून अपनी जगह है लेकिन लोगों की नीयत को कैसे सुधारा जाये! देश में लोकपाल कानून भी बन चुका लेकिन क्या नतीजे सामने आ रहे हैं। लोकटुक्त व्यवस्था पहके से लागू है। लोकायुक्त वयवस्था भी इतनी लाचार है कि लोकायुक्त का काम राज्यपाल को अपनी रिपोर्ट देने के बाद खत्म हो जाता है। रिपोर्ट पर लगभग कोई कार्यवाही नहीं हो पाती।
    कानून व्यवस्था पर तो सवाल उठते ही रहे हैं। हाल ही यह सूचना आई कि दिल्ली एयरपोर्ट से नोएडा जाते एक केंटर को लूट लिया गया जिसमें 26 करोड़ के इलेक्ट्रोनिक्स गैजेट्स भरे हुए थे। चार बदमाशों ने दिल्ली हाइवे पर इस लूट को अंजाम दिया। यह हमारे कानून व्यवस्था का मजाक नहीं तो और क्या है ? ऐसे अनेक उदहारण यहाँ प्रस्तुत किये जा सकते हैं। आये दिन बैंक और एटीएम लुटे जा रहे हैं। पेट्रोल पम्प लुट रहे हैं। पुलिस प्रशासन को मजबूत बनाने के खूब दावे किये जाते हैं, उन्हें आधुनिक हथियार और प्रशिक्षण दिए जा रहे हैं , साथ ही साइबर अपराधों से निपटने की हर संभव कोशिश की जा रही है लेकिन अपराधी अपने कारनामे अंजाम देने से बाज ही नहीं आते।
    इधर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी पार्टी की तमाम उठा-पटकों के बीच जनता से भ्रष्टाचार मिटाने के अपने वादे को लागू करने की सकारात्मक पहल की है, जो स्वागत योग्य कदम है। उन्होंने इस बारे में अपनी दृढ़ता और संकल्प को दोहराते हुए अपने कर्मचारियों से कहा है कि ‘तुम ईमानदारी से काम करो, मैं चट्टान की तरह तुम्हारे साथ खड़ा हूं। अगर बेईमानी करोगे तो मुझसे बड़ा दुश्मन कोई नहीं। जहन्नुम तक पीछा नहीं छोड़ूंगा।‘ केजरीवाल ने तालकटोरा स्टेडियम में भ्रष्टाचार विरोधी हेल्पलाइन नंबर 1031 के रिलॉन्चिंग के मौके पर कानूनों में सुधार करके पांच साल में भ्रष्टाचार में कमी और व्यापार करने के लिए दुनिया के अच्छे शहरों की सूची में पहले पांच में दिल्ली को शामिल कराने का वादा भी किया। उनका कहना था कि अन्ना आंदोलन तक हमारे अंदर भ्रष्टाचार से लड़ने का जुनून था, लेकिन 49 दिन की सरकार चलाकर 70 प्रतिशत तक भ्रष्टाचार खत्म करने की कामयाबी के बाद अब इसे खत्म करने के लिए उनमें आत्मविश्वास आ गया है। उन्होंने कहाकि अगर कर्मचारी-अधिकारी भ्रष्टाचार में लिप्त पाए गए तो हम मंत्री और विधायक के खिलाफ भी कार्रवाई करेंगे। आरोप साबित हुआ तो हम जेल भी जायेंगे। उन्होने अधिकारियों को हुक्म दिया कि अब अधिकारीगण अपने कार्यालय के बाहर लोगों को मोबाइल के साथ प्रवेश करने की अनुमति देने संबंधी सूचना और हेल्पलाइन का बोर्ड लगाएंगे। स्टिंग के डर से मोबाइल के साथ लोगों के कार्यालय में प्रवेश करने पर कोई पाबंदी नहीं नहीं लगेगी ।उन्होंने जनता से साफ कहा कि अब हर नागरिक इंस्पेक्टर होगा। अगर कोई रिश्वत मांगता है तो सामने वाले को मना करने की बजाय उसे रिश्वत के पैसे देकर उससे हुई बातचीत को रिकॉर्ड कर लो या उसका वीडियो बना लो। लोग सरकार से भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ शिकायत कर सकते हैं। सरकार उनके खिलाफ एक्शन लेगी। केजरीवाल का दिया गया यह कोई छोटा अधिकार नहीं है। इस प्रकार की व्यवस्था का अनुसरण सभी राज्यों की सरकारों द्वारा जनता के हित में किया जाना चाहिए।
     एक बात और, हमारे प्रधानमंत्रीजी ने बैंगलोर में पार्टी कार्यकारिणी की बैठक में कहा कि काले धन को वापस लाने के मामले में विपक्ष झूठ का सहारा ले रहा है। अगर प्रधानमंत्रीजी सही कह रहे हैं तो उन्हें यह भी बताना होगा की आखिर सच क्या है और विदेशों में जमा काले धन का पता लगाने के लिए अब तक क्या ठोस कदम उठाए गए। उन्हें झूठ का पर्दाफाश करने के लिए जनता को सच बताना होगा। गौरतलब है कि विधानसभा और लोकसभा चुनाव से पूर्व हमारे प्रधानमंत्री प्रत्याशी के रूप में उन्होंने जनता से वादा किया था कि वे काला धन वापस लाएँगे और वह धन इतना है कि प्रत्येक भारतीय के हिस्से में 15-15 लाख रुपए आएंगे। आज उनकी यह बात उपहास बनी हुई है और उन्हे स्पष्टीकरण देना पड़ा कि यह तो एक मुहावरा था। वोट हासिल करने के लिए ऐसे मुहावरों से बचा जाना चाहिए और वही कहना चाहिए जो सच हो। बरगलाने की भाषा से तात्कालिक लाभ तो भले ही मिल जाए, लेकिन आगे चलकर अंततः नुकसान ही उठाना पड़ता है। मूल प्रश्न यही है कि सरकार भ्रष्टाचार से लड़ रही है या नहीं, इससे लड़ने की दृढ़ इच्छा शक्ति भी है कि नहीं और क्या उसकी दिशा सही है। जनता इसका आकलन भी करती है। आज जरूरत इस बात की है कि देश भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद से मुक्त हो, जनता को सुशासन मिले और हर भारतीय का जीवन सुरक्षित हो। फिलहाल तो जनता कई मुश्किलें झेल रही है। सभी वर्ग के नागरिकों को सुशासन, सुरक्षा और सरकार के उसके हितैषी होने का आभाष होने पर ही शासन की सफलता टिकी है। अतः इस दिशा में कदम जितने तेजी से उठाए जाएंगे उतनी ही तेजी से देश की प्रतिष्ठा बढ़ेगी।


(फारूक आफरीदी)
वरिष्ठ लेखक और पत्रकार